श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

विन्देद् विरूपा विरुजा विमुच्यते

य आमयावीन्द्रियकल्पदेहम्।

एतत्पठन्‍नभ्युदये च कर्म-

ण्यनन्ततृप्तिः पितृदेवतानाम्॥ २७

vinded virūpā virujā vimucyate

ya āmayāvīndriyakalpadeham|

etatpaṭhannabhyudaye ca karma-

ṇyanantatṛptiḥ pitṛdevatānām|| 27

अर्थ

इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली कन्या समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पति प्राप्त करती है और विधवा इस व्रतसे निष्पाप होकर वैकुण्ठमें जाती है। जिसके बच्चे मर जाते हों, वह स्त्री इसके प्रभावसे चिरायु पुत्र प्राप्त करती है। धनवती किन्तु अभागिनी स्त्रीको सौभाग्य प्राप्त होता है और कुरूपाको श्रेष्ठ रूप मिल जाता है। रोगी इस व्रतके प्रभावसे रोगमुक्त होकर बलिष्ठ शरीर और श्रेष्ठ इन्द्रियशक्ति प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य मांगलिक श्राद्धकर्मोंमें इसका पाठ करता है, उसके पितर और देवता अनन्त तृप्ति लाभ करते हैं॥ २६-२७॥

यह अर्थ श्लोक 26–27 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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