श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्‍निवेदितमग्रतः।

अद्यादात्मविशुद्ध्यर्थं सर्वकामर्द्धये तथा॥ २०

udvāsya devaṃ sve dhāmni tanniveditamagrataḥ|

adyādātmaviśuddhyarthaṃ sarvakāmarddhaye tathā|| 20

अर्थ

इसके बाद भगवान्‌को उनके धाममें पधरा दे, विसर्जन कर दे। तदनन्तर आत्मशुद्धि और समस्त अभिलाषाओंकी पूर्तिके लिये पहलेसे ही उन्हें निवेदित किया हुआ प्रसाद ग्रहण करे॥ २०॥✎ 558 559 560 561 1614

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #558 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #559 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #560 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #561 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1614 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-शुद्धि → आत्मशुद्धि

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