श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.60

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एकदा सा तु सन्ध्यायामुच्छिष्टा व्रतकर्शिता।

अस्पृष्टवार्यधौताङ्‌घ्रिः सुष्वाप विधिमोहिता॥ ६०

ekadā sā tu sandhyāyāmucchiṣṭā vratakarśitā|

aspṛṣṭavāryadhautāṅghriḥ suṣvāpa vidhimohitā|| 60

अर्थ

दिति व्रतके नियमोंका पालन करते-करते बहुत दुर्बल हो गयी थी। विधाताने भी उसे मोहमें डाल दिया। इसलिये एक दिन सन्ध्याके समय जूठे मुँह, बिना आचमन किये और बिना पैर धोये ही वह सो गयी॥ ६०॥✎ 552

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #552 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा,तब → लगा, तब

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