श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.53

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स्त्रियो वीरवतीश्चार्चेत्स्रग्गन्धबलिमण्डनैः।

पतिं चार्च्योपतिष्ठेत ध्यायेत्कोष्ठगतं च तम्॥ ५३

striyo vīravatīścārcetsraggandhabalimaṇḍanaiḥ|

patiṃ cārcyopatiṣṭheta dhyāyetkoṣṭhagataṃ ca tam|| 53

अर्थ

इसके बाद पुष्पमाला, चन्दनादि सुगन्धद्रव्य, नैवेद्य और आभूषणादिसे सुहागिनी स्त्रियोंकी पूजा करे तथा पतिकी पूजा करके उसकी सेवामें संलग्न रहे और यह भावना करती रहे कि पतिका तेज मेरी कोखमें स्थित है॥ ५३॥

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