yāni ceha niṣiddhāni na vrataṃ ghnanti yāni tu|| 46
अर्थ
दितिने कहा—ब्रह्मन्! मैं उस व्रतका पालन करूँगी। आप बतलाइये कि मुझे क्या-क्या करना चाहिये, कौन-कौनसे काम छोड़ देने चाहिये और कौन-से काम ऐसे हैं, जिनसे व्रत भंग नहीं होता॥ ४६॥
धारयिष्ये व्रतं ब्रह्मन्ब्रूहि कार्याणि यानि मे।
यानि चेह निषिद्धानि न व्रतं घ्नन्ति यानि तु॥ ४६
दितिने कहा—ब्रह्मन्! मैं उस व्रतका पालन करूँगी। आप बतलाइये कि मुझे क्या-क्या करना चाहिये, कौन-कौनसे काम छोड़ देने चाहिये और कौन-से काम ऐसे हैं, जिनसे व्रत भंग नहीं होता॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 797) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/46/