श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.44

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इति संचिन्त्य भगवान्मारीचः कुरुनन्दन।

उवाच किञ्चित् कुपित आत्मानं च विगर्हयन्॥ ४४

iti saṃcintya bhagavānmārīcaḥ kurunandana|

uvāca kiñcit kupita ātmānaṃ ca vigarhayan|| 44

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! सर्वसमर्थ कश्यपजीने इस प्रकार मन-ही-मन अपनी भर्त्सना करके दोनों बात बनानेका उपाय सोचा और फिर तनिक रुष्ट होकर दितिसे कहा॥ ४४॥

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