श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.42

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

न हि कश्चित्प्रियः स्त्रीणामञ्जसा स्वाशिषात्मनाम्।

पतिं पुत्रं भ्रातरं वा घ्नन्त्यर्थे घातयन्ति च॥ ४२

na hi kaścitpriyaḥ strīṇāmañjasā svāśiṣātmanām|

patiṃ putraṃ bhrātaraṃ vā ghnantyarthe ghātayanti ca|| 42

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि स्त्रियाँ अपनी लालसाओंकी कठपुतली होती हैं। सच पूछो तो वे किसीसे प्यार नहीं करतीं। स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाईतकको मार डालती हैं या मरवा डालती हैं॥ ४२॥

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