श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.40

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

कोऽतिक्रमोऽनुवर्तन्त्याः स्वभावमिह योषितः।

धिङ् मां बताबुधं स्वार्थे यदहं त्वजितेन्द्रियः॥ ४०

ko'tikramo'nuvartantyāḥ svabhāvamiha yoṣitaḥ|

dhiṅ māṃ batābudhaṃ svārthe yadahaṃ tvajitendriyaḥ|| 40

अर्थ

इस स्त्रीका कोई दोष नहीं है; क्योंकि इसने अपने जन्मजात स्वभावका ही अनुसरण किया है। दोष मेरा है—जो मैं अपनी इन्द्रियोंको अपने वशमें न रख सका, अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थको न समझ सका। मुझ मूढको बार-बार धिक्कार है॥ ४०॥

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