सूतजी कहते हैं—शौनकजी! राजा परीक्षित्का प्रश्न थोड़े शब्दोंमें बड़ा सारगर्भित था। उन्होंने बड़े आदरसे पूछा भी था। इसलिये सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने बड़े ही प्रसन्न चित्तसे उनका अभिनन्दन करके यों कहा॥ २२॥
तद्विष्णुरातस्य स बादरायणि-
र्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत्।
सभाजयन् संनिभृतेन चेतसा
जगाद सत्रायण सर्वदर्शनः॥ २२
सूतजी कहते हैं—शौनकजी! राजा परीक्षित्का प्रश्न थोड़े शब्दोंमें बड़ा सारगर्भित था। उन्होंने बड़े आदरसे पूछा भी था। इसलिये सर्वज्ञ श्रीशुकदेवजी महाराजने बड़े ही प्रसन्न चित्तसे उनका अभिनन्दन करके यों कहा॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 794) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/22/