श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.8

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

प्रायशः प्राकृताश्चापि स्त्रियं रहसि बिभ्रति।

अयं महाव्रतधरो बिभर्ति सदसि स्त्रियम्॥ ८

prāyaśaḥ prākṛtāścāpi striyaṃ rahasi bibhrati|

ayaṃ mahāvratadharo bibharti sadasi striyam|| 8

अर्थ

प्रायः साधारण पुरुष भी एकान्तमें ही स्त्रियोंके साथ उठते-बैठते हैं, परन्तु ये इतने बड़े व्रतधारी होकर भी उसे भरी सभामें लिये बैठे हैं॥ ८॥

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