श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.38

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

जज्ञे त्वष्टुर्दक्षिणाग्नौ दानवीं योनिमाश्रितः।

वृत्र इत्यभिविख्यातो ज्ञानविज्ञानसंयुतः॥ ३८

jajñe tvaṣṭurdakṣiṇāgnau dānavīṃ yonimāśritaḥ|

vṛtra ityabhivikhyāto jñānavijñānasaṃyutaḥ|| 38

अर्थ

यही विद्याधर चित्रकेतु दानवयोनिका आश्रय लेकर त्वष्टाके दक्षिणाग्‍निसे पैदा हुए। वहाँ इनका नाम वृत्रासुर हुआ और वहाँ भी ये भगवत्-स्वरूपके ज्ञान एवं भक्तिसे परिपूर्ण ही रहे॥ ३८॥✎ 549

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #549 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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