श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् शंकरका यह भाषण सुनकर भगवती पार्वतीकी चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा॥ ३६॥
इति श्रुत्वा भगवतः शिवस्योमाभिभाषितम्।
बभूव शान्तधी राजन् देवी विगतविस्मया॥ ३६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् शंकरका यह भाषण सुनकर भगवती पार्वतीकी चित्तवृत्ति शान्त हो गयी और उनका विस्मय जाता रहा॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 791) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/36/