श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.3

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्कल्पसिद्धिषु।

रेमे विद्याधरस्त्रीभिर्गापयन् हरिमीश्‍वरम्॥ ३

kulācalendradroṇīṣu nānāsaṅkalpasiddhiṣu|

reme vidyādharastrībhirgāpayan harimīśvaram|| 3

अर्थ

महायोगी चित्रकेतु करोड़ों वर्षोंतक सब प्रकारके संकल्पोंको पूर्ण करनेवाली सुमेरु पर्वतकी घाटियोंमें विहार करते रहे। उनके शरीरका बल और इन्द्रियोंकी शक्ति अक्षुण्ण रही। बड़े-बड़े मुनि, सिद्ध, चारण उनकी स्तुति करते रहते। उनकी प्रेरणासे विद्याधरोंकी स्त्रियाँ उनके पास सर्वशक्तिमान् भगवान्‌के गुण और लीलाओंका गान करती रहतीं॥ २-३॥

यह अर्थ श्लोक 2–3 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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