पतिप्राणा देवि! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें॥ २४॥
अथ प्रसादये न त्वां शापमोक्षाय भामिनि।
यन्मन्यसे असाधूक्तं मम तत्क्षम्यतां सति॥ २४
पतिप्राणा देवि! मैं शापसे मुक्त होनेके लिये आपको प्रसन्न नहीं कर रहा हूँ। मैं तो यह चाहता हूँ कि आपको मेरी जो बात अनुचित प्रतीत हुई हो, उसके लिये क्षमा करें॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 789) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/24/