श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.21

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

एकः सृजति भूतानि भगवानात्ममायया।

एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः॥ २१

ekaḥ sṛjati bhūtāni bhagavānātmamāyayā|

eṣāṃ bandhaṃ ca mokṣaṃ ca sukhaṃ duḥkhaṃ ca niṣkalaḥ|| 21

अर्थ

एकमात्र परिपूर्णतम भगवान् ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दुःखकी रचना करते हैं॥ २१॥

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