eṣāṃ bandhaṃ ca mokṣaṃ ca sukhaṃ duḥkhaṃ ca niṣkalaḥ|| 21
अर्थ
एकमात्र परिपूर्णतम भगवान् ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दुःखकी रचना करते हैं॥ २१॥
एकः सृजति भूतानि भगवानात्ममायया।
एषां बन्धं च मोक्षं च सुखं दुःखं च निष्कलः॥ २१
एकमात्र परिपूर्णतम भगवान् ही बिना किसीकी सहायताके अपनी आत्मस्वरूपिणी मायाके द्वारा समस्त प्राणियोंकी तथा उनके बन्धन, मोक्ष और सुख-दुःखकी रचना करते हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 789) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/21/