भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा॥ १८
saṃsāracakra etasmiñjanturajñānamohitaḥ|
bhrāmyan sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca bhuṅkte sarvatra sarvadā|| 18
अर्थ
देवि! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसारचक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दुःख भोगता रहता है॥ १८॥
संसारचक्र एतस्मिञ्जन्तुरज्ञानमोहितः।
भ्राम्यन् सुखं च दुःखं च भुङ्क्ते सर्वत्र सर्वदा॥ १८
देवि! यह जीव अज्ञानसे मोहित हो रहा है और इसी कारण इस संसारचक्रमें भटकता रहता है तथा सदा-सर्वदा सर्वत्र सुख और दुःख भोगता रहता है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 789) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/18/