श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.16

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं शप्तश्चित्रकेतुर्विमानादवरुह्य सः।

प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत॥ १६

evaṃ śaptaścitraketurvimānādavaruhya saḥ|

prasādayāmāsa satīṃ mūrdhnā namreṇa bhārata|| 16

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पार्वतीजीने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्‍न करने लगे॥ १६॥

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