श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पार्वतीजीने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे॥ १६॥
एवं शप्तश्चित्रकेतुर्विमानादवरुह्य सः।
प्रसादयामास सतीं मूर्ध्ना नम्रेण भारत॥ १६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पार्वतीजीने इस प्रकार चित्रकेतुको शाप दिया, तब वे विमानसे उतर पड़े और सिर झुकाकर उन्हें प्रसन्न करने लगे॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 788) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/16/