श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.14

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नायमर्हति वैकुण्ठपादमूलोपसर्पणम्।

सम्भावितमतिः स्तब्धः साधुभिः पर्युपासितम्॥ १४

nāyamarhati vaikuṇṭhapādamūlopasarpaṇam|

sambhāvitamatiḥ stabdhaḥ sādhubhiḥ paryupāsitam|| 14

अर्थ

इसे अपने बड़प्पनका घमण्ड है। यह मूर्ख भगवान् श्रीहरिके उन चरणकमलोंमें रहनेयोग्य नहीं है, जिनकी उपासना बड़े-बड़े सत्पुरुष किया करते हैं॥ १४॥

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