आश्वास्य भगवानित्थं चित्रकेतुं जगद्गुरुः।
पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरिः॥ ६५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जगद्गुरु विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि चित्रकेतुको इस प्रकार समझा-बुझाकर उनके सामने ही वहाँसे अन्तर्धान हो गये॥ ६५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.65 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 786) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/65/