॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.59
स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम्।
अभयं चाप्यनीहायां सङ्कल्पाद्विरमेत्कविः॥ ५९
smṛtvehāyāṃ parikleśaṃ tataḥ phalaviparyayam|
abhayaṃ cāpyanīhāyāṃ saṅkalpādvirametkaviḥ|| 59
अर्थ
राजन्! सांसारिक सुखके लिये जो चेष्टाएँ की जाती हैं, उनमें श्रम है, क्लेश है और जिस परम सुखके उद्देश्यसे वे की जाती हैं, उसके ठीक विपरीत परम दुःख देती हैं; किन्तु कर्मोंसे निवृत्त हो जानेमें किसी प्रकारका भय नहीं है—यह सोचकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि किसी प्रकारके कर्म अथवा उनके फलोंका संकल्प न करे॥ ५९॥