श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.57

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यदेतद्विस्मृतं पुंसो मद्भावं भिन्‍नमात्मनः।

ततः संसार एतस्य देहाद्देहो मृतेर्मृतिः॥ ५७

yadetadvismṛtaṃ puṃso madbhāvaṃ bhinnamātmanaḥ|

tataḥ saṃsāra etasya dehāddeho mṛtermṛtiḥ|| 57

अर्थ

जब जीव मेरे स्वरूपको भूल जाता है, तब वह अपनेको अलग मान बैठता है; इसीसे उसे संसारके चक्करमें पड़ना पड़ता है और जन्म-पर-जन्म तथा मृत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती है॥ ५७॥✎ 545

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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