श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.52

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम्।

उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम्॥ ५२

loke vitatamātmānaṃ lokaṃ cātmani santatam|

ubhayaṃ ca mayā vyāptaṃ mayi caivobhayaṃ kṛtam|| 52

अर्थ

आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत‍्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं॥ ५२॥✎ 545

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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