ubhayaṃ ca mayā vyāptaṃ mayi caivobhayaṃ kṛtam|| 52
अर्थ
आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं॥ ५२॥✎ 545
लोके विततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम्।
उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम्॥ ५२
आत्मा कार्य-कारणात्मक जगत्में व्याप्त है और कार्य-कारणात्मक जगत् आत्मामें स्थित है तथा इन दोनोंमें मैं अधिष्ठानरूपसे व्याप्त हूँ और मुझमें ये दोनों कल्पित हैं॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 785) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने