॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.40
जितमजित तदा भवता
यदाऽऽह भागवतं धर्ममनवद्यम्।
निष्किञ्चना ये मुनय
आत्मारामा यमुपासतेऽपवर्गाय॥ ४०
jitamajita tadā bhavatā
yadā''ha bhāgavataṃ dharmamanavadyam|
niṣkiñcanā ye munaya
ātmārāmā yamupāsate'pavargāya|| 40
अर्थ
हे अजित! जिस समय आपने विशुद्ध भागवतधर्मका उपदेश किया था, उसी समय आपने सबको जीत लिया। क्योंकि अपने पास कुछ भी संग्रह-परिग्रह न रखनेवाले, किसी भी वस्तुमें अहंता-ममता न करनेवाले आत्माराम सनकादि परमर्षि भी परम साम्य और मोक्ष प्राप्त करनेके लिये उसी भागवतधर्मका आश्रय लेते हैं॥ ४०॥