राजन्! जैसे एक ही मृत्तिकारूप वस्तुमें घटत्व आदि जाति और घट आदि व्यक्तियोंका विभाग केवल कल्पनामात्र है, उसी प्रकार यह देही और देहका विभाग भी अनादि एवं अविद्या-कल्पित है*॥ ८॥
देहदेहिविभागोऽयमविवेककृतः पुरा।
जातिव्यक्तिविभागोऽयं यथा वस्तुनि कल्पितः॥ ८
राजन्! जैसे एक ही मृत्तिकारूप वस्तुमें घटत्व आदि जाति और घट आदि व्यक्तियोंका विभाग केवल कल्पनामात्र है, उसी प्रकार यह देही और देहका विभाग भी अनादि एवं अविद्या-कल्पित है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 776) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/15/8/
टिप्पणियाँ
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अनित्य होनेके कारण शरीर असत्य है और शरीर असत्य होनेके कारण उनके भिन्न-भिन्न अभिमानी भी असत्य ही हैं। त्रिकालाबाधित सत्य तो एकमात्र परमात्मा ही हैं। अतः शोक करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है।