जैसे जलके वेगसे बालूके कण एक-दूसरेसे जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहमें प्राणियोंका भी मिलन और बिछोह होता रहता है॥ ३॥✎ 541
यथा प्रयान्ति संयान्ति स्रोतोवेगेन वालुकाः।
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिनः॥ ३
जैसे जलके वेगसे बालूके कण एक-दूसरेसे जुड़ते और बिछुड़ते रहते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहमें प्राणियोंका भी मिलन और बिछोह होता रहता है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 775) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/15/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)