श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

शब्दादयश्‍च विषयाश्‍चला राज्यविभूतयः।

मही राज्यं बलं कोशो भृत्यामात्याः सुहृज्जनाः॥ २२

śabdādayaśca viṣayāścalā rājyavibhūtayaḥ|

mahī rājyaṃ balaṃ kośo bhṛtyāmātyāḥ suhṛjjanāḥ|| 22

अर्थ

अब तुम स्वयं अनुभव कर रहे हो कि पुत्रवानोंको कितना दुःख होता है। यही बात स्त्री, घर, धन, विविध प्रकारके ऐश्‍वर्य, सम्पत्तियाँ, शब्द-रूप-रस आदि विषय, राज्यवैभव, पृथ्वी, राज्य, सेना, खजाना, सेवक, अमात्य, सगे-सम्बन्धी, इष्ट-मित्र सबके लिये हैं; क्योंकि ये सब-के-सब अनित्य हैं॥ २१-२२॥✎ 1985

यह अर्थ श्लोक 21–22 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1985 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): जीवात्माका → जीवात्माकी

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