जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम ज्ञानका उपदेश देता; परन्तु मैंने देखा कि अभी तो तुम्हारे हृदयमें पुत्रकी उत्कट लालसा है, इसलिये उस समय तुम्हें ज्ञान न देकर मैंने पुत्र ही दिया॥ २०॥✎ 1985
तदैव ते परं ज्ञानं ददामि गृहमागतः।
ज्ञात्वान्याभिनिवेशं ते पुत्रमेव ददावहम्॥ २०
जिस समय पहले-पहल मैं तुम्हारे घर आया था, उसी समय मैं तुम्हें परम ज्ञानका उपदेश देता; परन्तु मैंने देखा कि अभी तो तुम्हारे हृदयमें पुत्रकी उत्कट लालसा है, इसलिये उस समय तुम्हें ज्ञान न देकर मैंने पुत्र ही दिया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 777) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/15/20/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—तत्रैव।
(मुद्रित पृष्ठ 777)
२
प्रा० पा०—ज्ञात्वात्माभि०।
(मुद्रित पृष्ठ 777)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1985 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): जीवात्माका → जीवात्माकी