॥ श्रीहरिः ॥
तस्माद्युवां ग्राम्यपशोर्मम मूढधियः प्रभू।
अन्धे तमसि मग्नस्य ज्ञानदीप उदीर्यताम्॥ १६
tasmādyuvāṃ grāmyapaśormama mūḍhadhiyaḥ prabhū|
andhe tamasi magnasya jñānadīpa udīryatām|| 16
अर्थ
स्वामियो! मैं विषयभोगोंमें फँसा हुआ, मूढ़बुद्धि ग्राम्य पशु हूँ और अज्ञानके घोर अन्धकारमें डूब रहा हूँ। आपलोग मुझे ज्ञानकी ज्योतिसे प्रकाशके केन्द्रमें लाइये॥ १६॥
तस्माद्युवां ग्राम्यपशोर्मम मूढधियः प्रभू।
अन्धे तमसि मग्नस्य ज्ञानदीप उदीर्यताम्॥ १६
स्वामियो! मैं विषयभोगोंमें फँसा हुआ, मूढ़बुद्धि ग्राम्य पशु हूँ और अज्ञानके घोर अन्धकारमें डूब रहा हूँ। आपलोग मुझे ज्ञानकी ज्योतिसे प्रकाशके केन्द्रमें लाइये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.15.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 776) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/15/16/