प्रभो! इस विषयमें हमें बहुत अधिक सन्देह है और सुननेका बड़ा कौतूहल भी है। अहो, वृत्रासुरका बल-पौरुष कितना महान् था कि उसने रणभूमिमें देवराज इन्द्रको भी सन्तुष्ट कर दिया॥ ७॥
अत्र नः संशयो भूयाञ्छ्रोतुं कौतूहलं प्रभो।
यः पौरुषेण समरे सहस्राक्षमतोषयत्॥ ७
प्रभो! इस विषयमें हमें बहुत अधिक सन्देह है और सुननेका बड़ा कौतूहल भी है। अहो, वृत्रासुरका बल-पौरुष कितना महान् था कि उसने रणभूमिमें देवराज इन्द्रको भी सन्तुष्ट कर दिया॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 768) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/7/