श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब सम्राट् चित्रकेतुने देखा कि मेरी रानी अपने मृत पुत्रके लिये इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विलाप कर रही है, तब वे शोकसे अत्यन्त सन्तप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे॥ ५९॥
विलपन्त्या मृतं पुत्रमिति चित्रविलापनैः।
चित्रकेतुर्भृशं तप्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह॥ ५९
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब सम्राट् चित्रकेतुने देखा कि मेरी रानी अपने मृत पुत्रके लिये इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विलाप कर रही है, तब वे शोकसे अत्यन्त सन्तप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 774) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/59/