श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.50

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रुत्वा मृतं पुत्रमलक्षितान्तकं

विनष्टदृष्टिः प्रपतन् स्खलन् पथि।

स्नेहानुबन्धैधितया शुचा भृशं

विमूर्च्छितोऽनुप्रकृतिर्द्विजैर्वृतः ॥ ५०

śrutvā mṛtaṃ putramalakṣitāntakaṃ

vinaṣṭadṛṣṭiḥ prapatan skhalan pathi|

snehānubandhaidhitayā śucā bhṛśaṃ

vimūrcchito'nuprakṛtirdvijairvṛtaḥ || 50

अर्थ

जब राजा चित्रकेतुको पता लगा कि मेरे पुत्रकी अकारण ही मृत्यु हो गयी है, तब अत्यन्त स्नेहके कारण शोकके आवेगसे उनकी आँखोंके सामने अँधेरा छा गया। वे धीरे-धीरे अपने मन्त्रियों और ब्राह्मणोंके साथ मार्गमें गिरते-पड़ते मृत बालकके पास पहुँचे और मूर्च्छित होकर उसके पैरोंके पास गिर पड़े। उनके केश और वस्त्र इधर-उधर बिखर गये। वे लंबी-लंबी साँस लेने लगे। आँसुओंकी अधिकतासे उनका गला रुँध गया और वे कुछ भी बोल न सके॥ ५०-५१॥

यह अर्थ श्लोक 50–51 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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