श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.42

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

एवं सन्दह्यमानानां सपत्न्याः पुत्रसम्पदा।

राज्ञोऽसम्मतवृत्तीनां विद्वेषो बलवानभूत्॥ ४२

evaṃ sandahyamānānāṃ sapatnyāḥ putrasampadā|

rājño'sammatavṛttīnāṃ vidveṣo balavānabhūt|| 42

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार वे रानियाँ अपनी सौतकी गोद भरी देखकर जलती रहती थीं और राजा भी उनकी ओरसे उदासीन हो गये थे। फलतः उनके मनमें कृतद्युतिके प्रति बहुत अधिक द्वेष हो गया॥ ४२॥✎ 540

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #540 शब्दोंके बीचका स्थान: है,धायसे → है, धायसे

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