श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.40

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम्।

सुप्रजाभिः सपत्नीभिर्दासीमिव तिरस्कृताम्॥ ४०

dhigaprajāṃ striyaṃ pāpāṃ patyuścāgṛhasammatām|

suprajābhiḥ sapatnībhirdāsīmiva tiraskṛtām|| 40

अर्थ

वे आपसमें कहने लगीं—‘अरी बहिनो! पुत्रहीन स्त्री बहुत ही अभागिनी होती है। पुत्रवाली सौतें तो दासीके समान उसका तिरस्कार करती हैं। और तो और, स्वयं पतिदेव ही उसे पत्‍नी करके नहीं मानते। सचमुच पुत्रहीन स्त्री धिक्कारके योग्य है॥ ४०॥✎ 540

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #540 शब्दोंके बीचका स्थान: है,धायसे → है, धायसे

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