श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.14.38

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

चित्रकेतोरतिप्रीतिर्यथा दारे प्रजावति।

न तथान्येषु सञ्जज्ञे बालं लालयतोऽन्वहम्॥ ३८

citraketoratiprītiryathā dāre prajāvati|

na tathānyeṣu sañjajñe bālaṃ lālayato'nvaham|| 38

अर्थ

प्रतिदिन बालकका लाड़-प्यार करते रहनेके कारण सम्राट् चित्रकेतुका जितना प्रेम बच्चेकी माँ कृतद्युतिमें था, उतना दूसरी रानियोंमें न रहा॥ ३८॥

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