परीक्षित्! जैसे यदि किसी कंगालको बड़ी कठिनाईसे कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है, वैसे ही बहुत कठिनाईसे प्राप्त हुए उस पुत्रमें राजर्षि चित्रकेतुका स्नेहबन्धन दिनोंदिन दृढ़ होने लगा॥ ३६॥
कृच्छ्रलब्धेऽथ राजर्षेस्तनयेऽनुदिनं पितुः।
यथा निःस्वस्य कृच्छ्राप्ते धने स्नेहोऽन्ववर्धत॥ ३६
परीक्षित्! जैसे यदि किसी कंगालको बड़ी कठिनाईसे कुछ धन मिल जाता है तो उसमें उसकी आसक्ति हो जाती है, वैसे ही बहुत कठिनाईसे प्राप्त हुए उस पुत्रमें राजर्षि चित्रकेतुका स्नेहबन्धन दिनोंदिन दृढ़ होने लगा॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 771) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/36/