महाराज! महर्षि अंगिराने देखा कि यह राजा बहुत विनयी है और मेरे पास पृथ्वीपर बैठकर मेरी भक्ति कर रहा है। तब उन्होंने चित्रकेतुको सम्बोधित करके उसे आदर देते हुए यह बात कही॥ १६॥
महर्षिस्तमुपासीनं प्रश्रयावनतं क्षितौ।
प्रतिपूज्य महाराज समाभाष्येदमब्रवीत्॥ १६
महाराज! महर्षि अंगिराने देखा कि यह राजा बहुत विनयी है और मेरे पास पृथ्वीपर बैठकर मेरी भक्ति कर रहा है। तब उन्होंने चित्रकेतुको सम्बोधित करके उसे आदर देते हुए यह बात कही॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 769) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/16/