॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.14.12
रूपौदार्यवयोजन्मविद्यैश्वर्यश्रियादिभिः।
सम्पन्नस्य गुणैः सर्वैश्चिन्ता वन्ध्यापतेरभूत्॥ १२
rūpaudāryavayojanmavidyaiśvaryaśriyādibhiḥ|
sampannasya guṇaiḥ sarvaiścintā vandhyāpaterabhūt|| 12
अर्थ
यों महाराज चित्रकेतुको किसी बातकी कमी न थी। सुन्दरता, उदारता, युवावस्था, कुलीनता, विद्या, ऐश्वर्य और सम्पत्ति आदि सभी गुणोंसे वे सम्पन्न थे। फिर भी उनकी पत्नियाँ बाँझ थीं, इसलिये उन्हें बड़ी चिन्ता रहती थी॥ १२॥