राजा परीक्षित्ने कहा—भगवन्! वृत्रासुरका स्वभाव तो बड़ा रजोगुणी-तमोगुणी था। वह देवताओंको कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था। ऐसी स्थितिमें भगवान् नारायणके चरणोंमें उसकी सुदृढ़ भक्ति कैसे हुई?॥ १॥✎ 538539
रजस्तमःस्वभावस्य ब्रह्मन् वृत्रस्य पाप्मनः।
नारायणे भगवति कथमासीद् दृढा मतिः॥ १
राजा परीक्षित्ने कहा—भगवन्! वृत्रासुरका स्वभाव तो बड़ा रजोगुणी-तमोगुणी था। वह देवताओंको कष्ट पहुँचाकर पाप भी करता ही था। ऐसी स्थितिमें भगवान् नारायणके चरणोंमें उसकी सुदृढ़ भक्ति कैसे हुई?॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 768) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/14/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)