श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स वै त्वाष्ट्रवधो भूयानपि पापचयो नृप।

नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इव भानुना॥ २०

sa vai tvāṣṭravadho bhūyānapi pāpacayo nṛpa|

nītastenaiva śūnyāya nīhāra iva bhānunā|| 20

अर्थ

जब वेदवादी ऋषियोंने उनसे अश्‍वमेध यज्ञ कराया तथा देवराज इन्द्रने उस यज्ञके द्वारा सर्वदेवस्वरूप पुरुषोत्तम भगवान्‌की आराधना की, तब भगवान्‌की आराधनाके प्रभावसे वृत्रासुरके वधकी वह बहुत बड़ी पापराशि इस प्रकार भस्म हो गयी, जैसे सूर्योदयसे कुहरेका नाश हो जाता है॥ १९-२०॥✎ 534 535 536 537

यह अर्थ श्लोक 19–20 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #534 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #535 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #536 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #537 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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