श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.13.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तं च ब्रह्मर्षयोऽभ्येत्य हयमेधेन भारत।

यथावद्दीक्षयाञ्चक्रुः पुरुषाराधनेन ह॥ १८

taṃ ca brahmarṣayo'bhyetya hayamedhena bhārata|

yathāvaddīkṣayāñcakruḥ puruṣārādhanena ha|| 18

अर्थ

परीक्षित्! इन्द्रके स्वर्गमें आ जानेपर ब्रह्मर्षियोंने वहाँ आकर भगवान्‌की आराधनाके लिये इन्द्रको अश्‍वमेध यज्ञकी दीक्षा दी, उनसे अश्‍वमेध यज्ञ कराया॥ १८॥✎ 534 535 536 537

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #534 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #535 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #536 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #537 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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