॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.13.11
तयेन्द्रः स्मासहत् तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत्।
ह्रीमन्तं वाच्यतां प्राप्तं सुखयन्त्यपि नो गुणाः॥ ११
tayendraḥ smāsahat tāpaṃ nirvṛtirnāmumāviśat|
hrīmantaṃ vācyatāṃ prāptaṃ sukhayantyapi no guṇāḥ|| 11
अर्थ
उसके कारण इन्द्रको बड़ा क्लेश, बड़ी जलन सहनी पड़ी। उन्हें एक क्षणके लिये भी चैन नहीं पड़ता था। सच है, जब किसी संकोची सज्जनपर कलंक लग जाता है, तब उसके धैर्य आदि गुण भी उसे सुखी नहीं कर पाते॥ ११॥