श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.31

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

निगीर्णोऽप्यसुरेन्द्रेण न ममारोदरं गतः।

महापुरुषसन्‍नद्धो योगमायाबलेन च॥ ३१

nigīrṇo'pyasurendreṇa na mamārodaraṃ gataḥ|

mahāpuruṣasannaddho yogamāyābalena ca|| 31

अर्थ

बल दैत्यका संहार करनेवाले देवराज इन्द्रने महापुरुष-विद्या (नारायणकवच)-से अपनेको सुरक्षित कर रखा था और उनके पास योगमायाका बल था ही। इसलिये वृत्रासुरके निगल लेनेपर—उसके पेटमें पहुँचकर भी वे मरे नहीं॥ ३१॥✎ 1950

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1950 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उँचा → ऊँचा

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