॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.12.28
दंष्ट्राभिः कालकल्पाभिर्ग्रसन्निव जगत्त्रयम्।
अतिमात्रमहाकाय आक्षिपंस्तरसा गिरीन्॥ २८
daṃṣṭrābhiḥ kālakalpābhirgrasanniva jagattrayam|
atimātramahākāya ākṣipaṃstarasā girīn|| 28
अर्थ
अब पैरोंसे चलने-फिरनेवाले पर्वतराजके समान अत्यन्त दीर्घकाय वृत्रासुरने अपनी ठोड़ीको धरतीसे और ऊपरके होठको स्वर्गसे लगाया तथा आकाशके समान गहरे मुँह, साँपके समान भयावनी जीभ एवं मृत्युके समान कराल दाढ़ोंसे मानो त्रिलोकीको निगलता, अपने पैरोंकी चोटसे पृथ्वीको रौंदता और प्रबल वेगसे पर्वतोंको उलटता-पलटता वह इन्द्रके पास आया और उन्हें उनके वाहन ऐरावत हाथीके सहित इस प्रकार लील गया, जैसे कोई परम पराक्रमी और अत्यन्त बलवान् अजगर हाथीको निगल जाय। प्रजापतियों और महर्षियोंके साथ देवताओंने जब देखा कि वृत्रासुर इन्द्रको निगल गया, तब तो वे अत्यन्त दुःखी हो गये तथा ‘हाय-हाय! बड़ा अनर्थ हो गया।’ यों कहकर विलाप करने लगे ॥ २७-३०॥✎ 1950