श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.24

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

आविध्य परिघं वृत्रः कार्ष्णायसमरिन्दमः।

इन्द्राय प्राहिणोद् घोरं वामहस्तेन मारिष॥ २४

āvidhya parighaṃ vṛtraḥ kārṣṇāyasamarindamaḥ|

indrāya prāhiṇod ghoraṃ vāmahastena māriṣa|| 24

अर्थ

राजन्! अब शत्रुसूदन वृत्रासुरने बायें हाथसे फौलादका बना हुआ एक बहुत भयावना परिघ उठाकर आकाशमें घुमाया और उससे इन्द्रपर प्रहार किया॥ २४॥

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