श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

भवानतार्षीन्मायां वै वैष्णवीं जनमोहिनीम्।

यद् विहायासुरं भावं महापुरुषतां गतः॥ २०

bhavānatārṣīnmāyāṃ vai vaiṣṇavīṃ janamohinīm|

yad vihāyāsuraṃ bhāvaṃ mahāpuruṣatāṃ gataḥ|| 20

अर्थ

अवश्य ही तुम लोगोंको मोहित करनेवाली भगवान्‌की मायाको पार कर गये हो। तभी तो तुम असुरोचित भाव छोड़कर महापुरुष हो गये हो॥ २०॥✎ 532

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #532 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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