श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वृत्रासुरके ये सत्य एवं निष्कपट वचन सुनकर इन्द्रने उनका आदर किया और अपना वज्र उठा लिया। इसके बाद बिना किसी प्रकारका आश्चर्य किये मुसकराते हुए वे कहने लगे—॥ १८॥
इन्द्रो वृत्रवचः श्रुत्वा गतालीकमपूजयत्।
गृहीतवज्रः प्रहसंस्तमाह गतविस्मयः॥ १८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वृत्रासुरके ये सत्य एवं निष्कपट वचन सुनकर इन्द्रने उनका आदर किया और अपना वज्र उठा लिया। इसके बाद बिना किसी प्रकारका आश्चर्य किये मुसकराते हुए वे कहने लगे—॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 763) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/12/18/