श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.8

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

ममर्द पद‍्भ्यां सुरसैन्यमातुरं

निमीलिताक्षं रणरङ्गदुर्मदः।

गां कम्पयन्‍नुद्यतशूल ओजसा

नालं वनं यूथपतिर्यथोन्मदः॥ ८

mamarda padbhyāṃ surasainyamāturaṃ

nimīlitākṣaṃ raṇaraṅgadurmadaḥ|

gāṃ kampayannudyataśūla ojasā

nālaṃ vanaṃ yūthapatiryathonmadaḥ|| 8

अर्थ

अब जैसे मदोन्मत्त गजराज नरकटका वन रौंद डालता है, वैसे ही रणबाँकुरा वृत्रासुर हाथमें त्रिशूल लेकर भयसे नेत्र बंद किये पड़ी हुई देवसेनाको पैरोंसे कुचलने लगा। उसके वेगसे धरती डगमगाने लगी॥ ८॥

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