श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.3

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

दृष्ट्वातप्यत संक्रुद्ध इन्द्रशत्रुरमर्षितः।

तान्‍निवार्यौजसा राजन् निर्भर्त्स्येदमुवाच ह॥ ३

dṛṣṭvātapyata saṃkruddha indraśatruramarṣitaḥ|

tānnivāryaujasā rājan nirbhartsyedamuvāca ha|| 3

अर्थ

राजन्! यह देखकर वृत्रासुर असहिष्णुता और क्रोधके मारे तिलमिला उठा। उसने बलपूर्वक देवसेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया और उन्हें डाँटकर ललकारते हुए कहा—॥ ३॥

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