श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अजातपक्षा इव मातरं खगाः

स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः।

प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा

मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥ २६

ajātapakṣā iva mātaraṃ khagāḥ

stanyaṃ yathā vatsatarāḥ kṣudhārtāḥ|

priyaṃ priyeva vyuṣitaṃ viṣaṇṇā

mano'ravindākṣa didṛkṣate tvām|| 26

अर्थ

जैसे पक्षियोंके पंखहीन बच्चे अपनी माँकी बाट जोहते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी माँका दूध पीनेके लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्‍नी अपने प्रवासी प्रियतमसे मिलनेके लिये उत्कण्ठित रहती है—वैसे ही कमलनयन! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है॥ २६॥

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