श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नन्वेष वज्रस्तव शक्र तेजसा

हरेर्दधीचेस्तपसा च तेजितः।

तेनैव शत्रुं जहि विष्णुयन्त्रितो

यतो हरिर्विजयः श्रीर्गुणास्ततः॥ २०

nanveṣa vajrastava śakra tejasā

harerdadhīcestapasā ca tejitaḥ|

tenaiva śatruṃ jahi viṣṇuyantrito

yato harirvijayaḥ śrīrguṇāstataḥ|| 20

अर्थ

इन्द्र! तेरा यह वज्र श्रीहरिके तेज और दधीचि ऋषिकी तपस्यासे शक्तिमान् हो रहा है। विष्णुभगवान्‌ने मुझे मारनेके लिये तुझे आज्ञा भी दी है। इसलिये अब तू उसी वज्रसे मुझे मार डाल। क्योंकि जिस पक्षमें भगवान् श्रीहरि हैं, उधर ही विजय, लक्ष्मी और सारे गुण निवास करते हैं॥ २०॥✎ 527 528

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #527 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #528 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें